वो इतनी आसानी से नहीं मिलती,
कि उसकी दूरी ही हमें ज़िंदा रखती है
हर मुलाक़ात इबादत बन जाती है,
और हर इंतज़ार सज़ा
आज एक शक्ल पर दिल ठहर-सा गया,
जैसे वक़्त ने अचानक साँस रोक ली हो
वो चेहरा…
उसका अक्स था,
और उसी अक्स ने मेरी रूह को छू लिया।
पहले सुकून उतरा,
फिर ग़ुस्सा जाग उठा
क्योंकि जो उसका हक़ था,
वो किसी और की सूरत में क्यों झलका?
हम उससे भी उलझ बैठे,
और सख़्त लहजे में कह दिया,
“तुमने उस चेहरे को चुरा लिया है,
जिसने कभी मेरा दिल चुराया था”
लेकिन सच यह था
कि लड़ाई उससे नहीं थी,
लड़ाई तो अपनी बेबसी से थी
कि जिसे रोज़ देखा भी नहीं,
उसी से मोहब्बत बेपनाह हो गई
और शायद
यही सबसे ख़ामोश,
सबसे सच्ची हार थी
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