वो हर बार नाराज़ मिलती है
और मैं हर बार थोड़ा और उसका हो जाता हूँ
उसकी बेरुख़ी मेरे इश्क़ की सबसे नाज़ुक जगह है
जहाँ चोट लगती है और मोहब्बत और पुख़्ता हो जाती है
वो मुझे नहीं चाहती शायद इसी लिए
मेरी चाहत में कोई शिकायत ज़िंदा नहीं रहती
उसकी दूरी मेरे सब्र का साज़ बन जाती है
और उसकी ख़ामोशी मेरे दिल की सबसे सच्ची ज़बान
वो रूठ कर चल देती है
मैं ठहर कर बस इतना समझ पाता हूँ
कि हर रिश्ता हासिल करने के लिए नहीं होता
कुछ रिश्ते खुद को सौंप देने के लिए होते हैं
कि हर प्यार मुकम्मल होने की ज़िद नहीं करता
कुछ प्यार अधूरा रहकर भी मुकम्मल होते हैं
और शायद इसी अधूरेपन में
इश्क़ अपनी सबसे ऊँची शक्ल पाता है
क्योंकि कुछ प्यार पाने के लिए नहीं
निभाने के लिए होते हैं
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