प्यार का भ्रम टूट गया है,
उसका साथ छूट गया हैं।
जिसे समझा हमने अपना,
वो ही हमको लूट गया है।
कहां गया वो प्यार घनेरा,
कहां गया वो मासूम चेहरा।
पूछ रहीं हैं कलम मुझ से,
क्यों नहीं तूं ने गीत उकेरा।
कैसे लिखूं गीतों की माला,
शब्दों से छ्न्द छूट गया हैं।
जिसे समझा हमने अपना,
वो ही हमको लूट गया है।
मुश्किल हैं उसमें उतरना,
उसमें खो के गीत बनाना।
कितना मुश्किल होता आशु,
दिल रोएं और हंसते रहना।
जिस माला में मुझे पिरोया,
वो ही धागा टूट गया हैं।
जिसे समझा हमने अपना,
वो ही हमको लूट गया है।
-आशु सिंह अमिट
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