सबीर हका ईरानी मज़दूर हैं जिन्हें मज़दूरी के लिए लिखी उनकी मार्मिक कविताओं के लिए जाना जाता है। उनके लिए कवि गीत चतुर्वेदी लिखते हैं कि -
सबीर हका की कविताएं तड़ित-प्रहार की तरह हैं। सबीर इमारतों में निर्माण-कार्य के दौरान मज़दूरी करते हैं। उनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हैं और ईरान श्रमिक कविता स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार पा चुके हैं लेकिन कविता से पेट नहीं भरता, पैसे कमाने के लिए ईंट-रोड़ा ढोना पड़ता है। एक इंटरव्यू में सबीर ने कहा था, ''मैं थका हुआ हूं, बेहद थका हुआ, मैं पैदा होने से पहले से ही थका हुआ हूं। मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं। मैं अपनी मां की थकान महसूस कर सकता हूं। उसकी थकान अब भी मेरे जिस्म में है।"
- गीत चतुर्वेदी (अनुवादक)
गीत की लिखी यह पंक्तियां और सबीर की कही यह बात कि 'मैं बेहद थका हुआ हूं' उनके जीवन के कष्ट को उकेरती है। उन्होंने इन्हीं भावनाओं को अपनी कविता में दर्ज किया है। अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर पढ़ें उनकी कविताएं
शहतूत...
क्या आपने कभी शहतूत देखा है,
जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर
उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है.
गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं.
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए
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