नज़र में जो आई हक़ीक़त वही है।
ज़माने की हर इक रिवायत वही है।
बदलते हैं चेहरे यहाँ वक़्त पाकर,
मगर ख़्वाहिशों की सियासत वही है।
मिटाते हैं जो ख़ुद को औरों के ख़ातिर,
ज़माने में उनकी इबादत वही है।
परिंदों को उड़ना सिखाती है ठोकर,
बुलंदी की पहली हिदायत वही है।
जिसे ढूँढते थे चराग़ों की लौ में,
अँधेरों में उसकी हिदायत वही है।
सफ़र में अकेले ही चलना है सबको,
मगर साथ चलती मोहब्बत वही है।
फ़रेबों के जंगल में, 'अज़हर', हमेशा
चराग़-ए-सदाक़त की क़ीमत वही है।
- अज़हर साबरी
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