तिरे हिज्र में उम्र कटती रही।
ये मर्मर की मूरत सँवरती रही।
नज़र जिस तरफ़ भी गई उम्र भर,
तिरी याद दिल में उतरती रही।
किसी की सदा का सहारा न था,
तिरे ज़िक्र से रात कटती रही।
बदलते रहे लोग हर मोड़ पर,
तिरी याद दिल में ठहरती रही।
ज़माने ने जितने भी पत्थर दिए,
मोहब्बत उसी से सँवरती रही।
बिखरने लगे ख़्वाब जब भी मिरे,
तिरी याद दीवार बनती रही।
हवाओं में बिखरा वफ़ा का धुआँ,
पुरानी कहानी सुलगती रही।
किताबों में दबकर भी मुद्दत तलक,
वो फूलों की ख़ुशबू महकती रही।
तसव्वुर में तेरे ही जीते रहे,
यूँ ही ज़िंदगी अपनी कटती रही।
मियां अपने अश्कों को यूँ न छुपा,
इन्हीं से ग़ज़ल भी निखरती रही।
- अज़हर साबरी
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