शहर में अब शराफ़त का बस नाम रह गया है,
हर शख़्स के चेहरे पे इक नक़ाब रह गया है।
सियासत ने बाँट दिया है आँगन के रिश्तों को,
मजहब के नाम पर ही अब विवाद रह गया है।
परिंदे भी अब खौफ़ में सहमे सहमे रहते हैं,
जंगल में भी पेड़ो का सिर्फ निशान रह गया है।
पसीने की कमाई तो चंद हाथों में सिमट गई,
मज़दूर के हिस्से में बस थकान रह गया है।
वो ज़ुल्फ़ें जो घटा बन के कभी छाया करती थी
अब काग़ज़ी फूलों का वो बस श्रृंगार रह गया है।
जला कर घर किसी का वो वतन की बात करते हैं,
सियासतदानों में अब कहाँ लिहाज़ रह गया है।
बुजुर्गों की नसीहतें अब रद्दी के भाव बिकती हैं,
किताबों के पन्नों में ही दबकर संस्कार रह गया है।
सगे भाई भी अब हाथ मिलाते हुए डरते हैं,
खून के रिश्तों में ज़मीनी फसाद रह गया है।
ख़रीद लेते हैं यहाँ लोग ज़मीर भी चंद सिक्कों में,
अब तो झूठ का ही चारों तरफ़ बाज़ार रह गया है।
वो जो कहते थे कि ज़हर भी पी लेंगे दोस्ती में,
वफ़ा के नाम पर अब बस एक मज़ाक रह गया है।
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