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विवश वियोगी

                
                                                         
                               प्यारी लगती मुझे,  नीरव  , तन्हाईयां
                                                                 
                            
  अकृतज्ञ,अपनों की,   प्रदत रुसवाईयां।
  ढलती उम्र,  व कृतित्व की सायं बेला में
  वर्धाक्य पसंद ,     गमों की परछांईयां।।

कुछ मानने लगे मुझे  अवसाद का रोगी
किन्हीं के नजरों में, भोगार्थ बना  योगी।
कुछ दोष देते उम्र के  'पस्त पड़ाव' को
कुछेक ख़यालों मे एक 'विवश वियोगी'।।

आगत समय डराता,  हंसता गत्य है
कहते   दुनिया में,  बस मृत्यु सत्य है।
सपनों व तथाकथित अपनों के बीच
एकाकीपन ही  सर्वस्वीकृत तथ्य है।।

अधूरे रिश्तों की      हो रही नुमाइशें
दर्द और कविता में जोर अजमाइशें।
बेदर्दी कौन बड़ा,हो रही खिंच तान
देख रही मृत्यु भी ,  निज गुंजाइशे।।

यादों की पोटली ले  सोता सिरहाने
दर्दों को ओढ़ लेता  चादर के बहाने।
चिथड़ा दिल करता कर्र कर्र आवाज
सिलने को मिलते फरेबी ताने-बाने।।

सपने देते  खुली पलकों  को  ताने
जो निंद छोड़ लगे हैं  आँसू बहाने।
हक़ीक़त,अब , ख्वाब, लगे  लगने
अपने हैं   बन चुके,   बेवक्त बेगाने ।।

वेदना की वेदी पर,  सपनें चढ़ा बलि
समझौता या हार, एकमात्र तसल्ली।
दगाबाजों के दरख्त में अनचाहे फंसकर
मैं वफा ढूंढता हूँ ,    बेवफा की  गली।।
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41 मिनट पहले

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