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गुलशन मदान: हम को सच कहने की क़ीमत मिल गई

gulshan madaan famous ghazal hum ko sach kahne ki qeemat mil gayi
                
                                                         
                            


हम को सच कहने की क़ीमत मिल गई
कुछ न कहने की नसीहत मिल गई

मुद्दतों के बा'द आया ख़त तिरा
यूँ लगा जैसे रियासत मिल गई

मिल गया ईमान-दारी का हुनर
बस बुज़ुर्गों की विरासत मिल गई

वो सिकंदर भी तो ख़ाली ही गया
क्या हुआ जो तुम को दौलत मिल गई

आप मुझ से राह में क्या मिल गए
शहर भर को इक शरारत मिल गई

और क्या जीने को 'गुलशन' चाहिए
थोड़ा ग़म थोड़ी मोहब्बत मिल गई

एक दिन पहले

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