आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नज़्म–ए–मोहब्ब्त

                
                                                         
                            तेरा अक्स है मिलता हु- ब - हु मेरे ख्वाबों की तस्वीर से
                                                                 
                            
राबता तुझसे वो जुड़ा, जो जुड़ता है तक़दीर से।
चांद भी रोशन हो जाए तेरी आंखों में वो नूर है
तू तसव्वुर है मेरा, तू एक सराब है
तभी तो दिल के क़रीब पर नज़रो से दूर है।
तुझे मेरी किस्मत में उस कातिब ए तक़दीर ने लिखा ही कहां?
फिर भी राह ए मोहब्बत के मुसाफ़िर हम बने, जिसके रास्ते अंजान और मंज़िल भी लापता।
बेखबर बेखुदी को ही हमसफर बनाया अब
इश्क़ में बे बसीरत बंदे को क्या मालूम
कब रात ढली और सुबह का सवेरा छाया कब।
ढूंढ़ता हर शक्स में तुझको कि मिल जाए तू यही कही
फिर हंसता खुद की नादानी पे क्योंकि जानता हूं
तू बस मेरे ख्यालों में है मेरी...
पर हक़ीक़त है कि तू मेरी हक़ीक़त नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर