शाम और सुबह भी लगने लगेगी दुपहरी,
जाना पड़ा गर तुम्हें भूल से भी कचेहरी।
मामला हो घर का तो वहीं निपटाओ उसे,
खींच के ना लाना प्यारे उसे तुम कचेहरी।
उम्र गुजर जायेगी तारीख नोट करते,
इम्तहान लेगी सब्र का तुम्हारे कचेहरी।
रिश्ते हो जायेंगे समझौते के गुलाम फिर,
फैसला अपनों का जब सुनाएगी कचेहरी।
कभी माफी मांग लो तो कभी माफ कर दो,
रहे कोशिश यही कि ना जाना पड़े कचेहरी।
हां ये सच है कि न्याय होता यहीं पर है,
बदले में सुख चैन छीन लेती है कचेहरी।
-बृज लाल तिवारी
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