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लम्हे

                
                                                         
                            एक आश लगाये बैठे है
                                                                 
                            
दर पे तुम्हारे सर झुकाए बैठे है
अब तक न कोई आवाज आई
न ही कोई हवा का झोका आया।
जिन्दगी जो चल रही है
यादो मे या किसी के सहारे
कभी बैशाखी के सहारे
तो कभी रफ्तार पकड रही है
फिर भी जिन्दगी चल रही है।
हम आज भी उनको याद करते है।
वो हमको कब के भूल गये होगे।
फिर भी हम फरियाद करते है।
उनके साथ बिताये लम्हो की याद नही जाती।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
57 मिनट पहले

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