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"रिश्तों का आईना"

                
                                                         
                            ये जो मेरे अपने मुझे अपना कहते हैं,
                                                                 
                            
सच कहूँ तो अब ये सब ढोंग लगते हैं।
जब भी पड़ी ज़रूरत, सबने रास्ते बदल लिए,
दिमाग चलाकर वो रिश्तों का कत्ल करते हैं।
जिन्होंने कभी किताबों के पन्ने तक पलटे नहीं,
वो आज मेरी दिन-रात की मेहनत का हिसाब माँगते हैं।
पर अब मैंने भी जबरदस्ती के रिश्ते पकड़ना छोड़ दिया,
क्योंकि आईने में खड़े शख्स पर ही हम ऐतबार करते हैं,
अजीब दस्तूर है इस मतलबी दुनिया का 'दीप',
यहाँ लोग मरे हुए इंसान को कंधा देना पुण्य समझते हैं,
और जीते जी किसी बेबस को सहारा देना बोझ समझते हैं।


 
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39 मिनट पहले

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