मैं गुजरात (अब पाकिस्तान) के एक गांव लंगरायल में पैदा हुई। आसपास के
प्राकृतिक सौंदर्य और अकेलेपन ने आठ साल की उम्र में ही मुझे कविता लेखन की
ओर प्रवृत्त कर दिया था। स्कूल और कॉलेज में मैं वहां की साहित्यिक
पत्रिकाओं की संपादक थी। मैं इतनी कविताएं लिखती थी कि बाईस साल की उम्र
में मेरे चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। बचपन में प्रकृति से मुझे
इतना प्रेम हुआ कि लगभग पूरी जिंदगी मैंने प्रकृति के बीच ही गुजारी।
प्रकृति मेरी कविताओं से हमेशा जुड़ी रही, तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी है।
शुरुआत में देश की आजादी के लिए चले आंदोलन से प्रभावित होकर मैंने
देशभक्तिपूर्ण कविताएं लिखी थीं। लेकिन बाद में अपनी प्रेम कविताओं के लिए
ही मैं ज्यादा जानी गई। अलबत्ता मैंने हमेशा कविता की परंपरा से अलग हटकर
लिखने के बारे में सोचा। मेरा स्पष्ट तौर पर यह मानना है कि अलग तरह से
लेखन ही एक साहित्यकार के तौर पर आपको सुप्रतिष्ठित करता है। हालांकि मैंने
छोटी कहानियां भी लिखीं, लेकिन पंजाब और उससे बाहर मुझे एक कवयित्री के तौर
पर ही ज्यादा जाना गया। मैं इस मामले में भाग्यशाली हूं कि मेरे परिवार में
ज्यादातर लोग साहित्य और कला से जुड़े हैं। मेरे पति कर्नल नरेंद्रपाल सिंह
एक आला दर्जे के उपन्यासकार हैं। मेरी बड़ी बेटी निरुपमा कवि बनी, तो छोटी
बेटी अनुपमा को पेंटिंग ने आकर्षित किया। यह भी एक संयोग है कि साहित्यिक
योगदान के लिए मुझे और मेरे पति, दोनों को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।
लेकिन एक लेखक का मूल्यांकन पुरस्कारों से नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक योगदानों से होता है।
-प्रभजोत कौर, चर्चित पंजाबी कवयित्री
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