गुजरता रहा मैं, भटकता रहा..
मिल जाए कुछ, मैं जगता रहा।
जो भी मिला, बहुत सुंदर मिला
मिलने की आशा में रहता रहा।
जिस जिस के करीब होता गया
मुझे संभाला और भरोसा दिया।
नई डार पर गाता गुनगुनाता रहा
हर कदम, नए जिद्द बढ़ाता रहा।
अमन मिल रही, खुशी मिल रही
सुहाने पल में बांहें फैलाता रहा।
जीवन के डोरे बढ़ाते बढ़ाते हुए
सारी खुशियां मन में समाता रहा।
- देवनन्दन कुमार
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