तेरी नज़रें झुकी झुकी क्यों हैं,
इस क़दर हमसे बेरुख़ी क्यों है।
क्या सबब है तेरी उदासी का,
और आंखों में ये नमी क्यों है।
साथ बैठे हो कुछ तो बात करो,
लबों पे इतनी ख़ामुशी क्यों है।
सामने दरिया है, समंदर है,
फिर न जाने ये तिश्नगी क्यों है।
आफ़ताब, माहताब रौशन हैं,
दिलों पर छाई तीरग़ी क्यों है।
भीड़ हर सिम्त है यहां "शमीम",
इतना तन्हा हर आदमी क्यों है।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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