धन - सेवा से
पहाड़ देखता है, सूने आंगन और बंजर खेतों को।
लगता है धन की धारा तभी टिकती, जब वो सबके लिए बहती।
लोभ में बंधा धन रेत सा फिसल जाता।
सेवा में बहा धन, गांव की धड़कन बन जाता।
शक्ति - धर्म से
जंगल कटते हैं तो नदियां चुप हो जाती।
सोचता हूं शक्ति शायद दुसरे को झुकाना नहीं होती।
शायद वो संकल्प है, जो सच के साथ खड़ा हो।
जो निर्बल का कंधा बने, वही शक्ति पूजनीय लगती।
यश - कर्तव्य से
युवा जब अपने गांव की माटी से जुड़े,
नाम अपने आप चल पड़े।
शिक्षा की रोशनी सिर्फ नौकरी का रास्ता नहीं दिखाती,
वो रास्ता दिखाती, जहां समाज बनता।
यश शायद वही, जो प्रचार न मांगे, पर याद रह जाए।
सौंदर्य - संस्कार से
जब भूमि बिकती तो चेहरों की रौनक भी धुंधली पड़ जाती।
लगता असली सौंदर्य रूप में नहीं, चरित्र में बसता।
वाणी में मिठास हो, व्यवहार में मर्यादा हो,
तो मनुष्य खुद देवभूमि का सबसे सुंदर हिस्सा लगने लगे।
ज्ञान - जिज्ञासा से
कलम चलती है तो सवाल जन्म लेते, और सवालों से रास्ते खुलते हैं।
ज्ञान शायद किताबों से शुरू होता है, पर खुद को जानने पर पूरा होता है।
बड़ों की बात सुनो, अनुभव से सीखो, और मन से पूछो, मैं कौन हूं।
ऐसा ज्ञान ही अंधेरों में दीपक बनता है।
त्याग - वैराग्य से
पुरखों की कहानियां सुनता हूं, उन्होंने सब कुछ देकर ये धरती बचाई थी।
समझ आता है त्याग का मतलब सब छोड़ देना नहीं है।
शायद मतलब ये है, जो जरूरी नहीं उसे धीरे से रख देना।
जब 'मैं' हल्का हो जाता है, तो 6 ऐश्वर्य बोझ नहीं, आशीर्वाद लगते हैं।
माँ का आशीर्वाद से
सेवा से हो धन की खुशबू, धर्म से हो शक्ति का बल, कर्तव्य से हो यश की गंध।
संस्कार से सौंदर्य, जिज्ञासा से ज्ञान, वैराग्य से त्याग का सुकून।
देवभूमि फिर हंसे, जब हम अपने हो जाएं।
- देवकी नन्दन
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