आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भ्रम के उस पार

                
                                                         
                            तुमने क्या कहा...?
                                                                 
                            
सुनो...
क्या अब भी
भ्रम में जी रहे हो,
या कल्पनाओं को
हक़ीक़त मान बैठे हो?
मुझे पता है...
वक़्त की आग
तुम्हें भी तपाएगी।
सिक्के के तो
दो ही चेहरे होते हैं,
मगर इंसानों के...
अनगिनत।
मैं तब लिखती हूँ,
जब डर
मेरे भीतर बोलता है।
काश...
तुम मेरी आँखों से
दुनिया देख पाते,
मैंने उम्मीदों को
जलते देखा है।
सुकून मेरा चुनाव है,
मगर सफ़र
रेगिस्तानों का है,
और सपने
अब भी आसमान के।
मज़बूत बनो...
क्योंकि यहाँ
सहारा कम,
इम्तिहान ज़्यादा मिलते हैं।
मैं लेखिका नहीं...
बस ज़िंदगी को
गहराई से महसूस करती हूँ।
खुद को फिर से जगा लो...
क्योंकि हर लड़ाई
ख़ुद ही लड़नी पड़ती है।
और सुनो...
उस अथाह अँधेरे में
मत उतरना।
मेरे शब्द याद रखना...
ये बददुआ नहीं,
ज़िंदगी का सबक़ हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
35 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर