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सोच पर पहरा

                
                                                         
                            उन्होंने कहा,
                                                                 
                            
सोचना भी क़ानून में लिखो,
वरना सोच पर भी मुक़दमा होगा।

हर चौक पर हुक्म लटका है,
हर ज़ेहन पर पहरा बैठा है,
कलम अगर सच्चाई लिखे,
तो काग़ज़ भी देशद्रोही होगा।

कुर्सियों ने ख़्वाबों को नापा,
नाप दिए सूरज–चाँद के रास्ते,
और बच्चों को पाठ पढ़ाया,
सिर झुकाना ही देशभक्ति होगा।

अरबाब-ए-हुकूमत चाहते हैं
कि दिमाग़ भी सरकारी हों,
दिल भी नियमावली से धड़कें,
और हर सवाल गुनाह होगा।

मगर सुनो साहिबो,
इतिहास कभी भी
डर से नहीं चलता,
जो आग बुझाने निकले हैं,
उनके हाथ ही पहले जलते हैं।

हम वो लोग हैं
जो सलाख़ों से भी सोच लेते हैं,
हम वो नस्ल हैं
जो फ़रमानों से नहीं पलती।

तुम निज़ाम बदलो,
हम आवाज़ बदल देंगे,
तुम मुँह पर ताले लगाओ,
हम साँसों से नारे लिख देंगे।

क्योंकि जिस मुल्क में
सोच पर पहरा हो,
वहाँ ख़ामोशी भी
इंक़लाब की भाषा होती है।

हम सोचेंगे, हम बोलेंगे, हम लड़ेंगे,
निज़ाम की सलाख़ें तोड़ेंगे।
हर फ़रमान को चुनौती देंगे,
और अपनी आज़ादी खुद लिखेंगे!
- धनु वर्मा
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एक दिन पहले

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