बहुत रोया बहुत तड़पा, मोहब्बत की कहानी पर,
लिखा है ख़ून से अपना, पता रेत-ए-रवानी पर।
तुम्हें कैसे मैं ग़म देता, कभी तुम दिल हमारे थे,
मैं ख़ुद ही ज़हर पीता हूँ, तुम्हारी मेहरबानी पर।
कलेजा चीर देती है, तुम्हारी याद की दस्तक,
हज़ारों ज़ख़्म उभरे हैं, मेरी कच्ची जवानी पर।
न पूछो किस तरह हमने, गुज़ारे हैं ये शब-ओ-दिन,
कयामत टूट पड़ती है, ज़रा सी बद-गुमानी पर।
अकेला छोड़ कर मुझको, कहाँ तुम खो गए आख़िर,
अब आँसू भी नहीं गिरते, मिरी इस बे-ज़ुबानी पर।
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