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गुज़ारिश

                
                                                         
                            काशी में वही रहता, काबे में भी वही
                                                                 
                            
गुरुद्वारे वही बसता, गिरजा में भी वही

कैसा मुक़ाबला ये, कैसी ये सनक है
लड़-थके भाई-भाई, माँ-बाप है वही

इंसान हो तो काम, इंसान के आना
मुर्शिद की गुज़ारिश ये, इबादत है बस वही

तेरे लिये न ज्यादा, न उस के लिये कम
हर शै में बसर उस का, नज़र-ए-करम वही

बिन माँगे झोली भरता, देता नहीं जनाय
कहता तू जिस को साईं, साहेब मेरा वही

खोया था जो वज़ूद में, वापस वहीं मिला
दिल की खुशी, चैन-ओ-सुकूँ, रंगीनियाँ वही

दुनिया से गुजरना तो ऐसे ही गुजरना
तुझ से जहाँ मुक़म्मल, आगे भी बस वही

- डॉ. रश्मि झा
 
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4 वर्ष पहले

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