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माँ को भी नज़रें लगतीं हैं

                
                                                         
                            माँ को भी नज़रें लगती हैं
                                                                 
                            
कभी उसकी नज़र उतारा कर

हरदम अपना हिस्सा देती
कभी अपने कौर खिलाया कर

लोरी में सपने परियों के
तू अपनी नींद सुलाया कर

दुख में जो पलकें छलक़ीं
बच्चों सा उसे बहलाया कर

कुछ भी न माँगे खुद के लिए
उसके सजदे झुक जाया कर

खुशियाँ दे सदा दुलारे जो
उसको भी लाड़ लड़ाया कर

कैसी भी हो सुंदर लगती
काजल का टीका लगाया कर

इक पल न बैठे तेरे लिए
दुखते पाँव दबाया कर

जय-जय करना सिखलाया था
तू तीरथ-धाम कराया कर

कान्हा सा तुझे सजाती थी
उसकी बंसी बन जाया कर

गोदी उसके मेले घूमा
तू भी दुनिया दिखलाया कर

चलना सीखा था उँगली पकड़
उस की लाठी बन जाया कर

अक्षर, विद्या का ज्ञान दिया
गीता-रामायण सुनाया कर

माँ के हाथों का स्वाद न भूल
घी चुपड़ के रोटी खिलाया कर

वार दिया सब कुछ तुम पर
कर प्यार, गले लग जाया कर

जब थोड़ा वक़्त तेरा माँगे
दुनियादारी न समझाया कर

उस दूध का कुछ तो क़र्ज़ उतार
भवसागर पार कराया कर

दुनिया की दौलत कर कुर्बान
तू रूह की नेमत पाया कर

पीड़ा सह जिसने जना तुझे
उसका बचपन लौटाया कर

माँ को भी नज़रें लगती हैं
कभी उसकी नज़र उतारा कर

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3 वर्ष पहले

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