ज़िंदगी इम्तिहान देता हूँ
एक रब का ही नाम लेता हूँ
माफ करना मेरी खताओं को
सारे क़िस्से तमाम करता हूँ
तेरे कितने सवाल हैं बाकी
मैं कहाँ अब सवाल करता हूँ
छोड़ दी फिक्र अब ज़माने की
मैं तो अपने हिसाब चलता हूँ
शौक़ जीने का तो मुझी को है
हर सबक अपने नाम करता हूँ
तेरे जलवों की मस्तियों के लिये
अब तो सब से मैं प्यार करता हूँ
अपने हिस्से की भी ईदी देकर
ईद का चाँद नज़र करता हूँ
कोई सुन ले न गुफ्तगू अपनी
ख़मोशियों में बात करता हूँ
अब तो ये हाल है मेरे मालिक
तुम को महसूस भी मैं करता हूँ
सारी दुनिया का नूर अपनी जगह
मैं अपना हिंदुस्तान लेता हूँ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X