एक बार फिर से...!
प्रकृति की याद में...॥
है नि:शब्द !
यह प्रकृति ?
निर्मूल है निराकार॥
प्रकृति है।
सब पर समान॥
जब ,
चलती बयार !
है शब्द किसके ?
प्रकृति के !
या ;
है पवन पुर्वैया॥
सनसनाहट , सरसराहट !
तेज धूप में गर्म हवा।
बरसाती पानी छनकती !
फिर ;
सरसराहट सनसनाहट॥
है यहाँ बस ,
एक ही शब्द !
बरसात हो।
या ,
गर्मी का सच॥
आसमान नीला अंबर।
एक रूप पर कहाँ है मूल॥
जिसने खोजा ,
जान सका ना !
तर्क वही पर ,
मिला ना मूल॥
जिधर चलें हो जाते दूर।
आसमान प्रकृति का मूल॥
प्रकृति है।
यहाँ भी निर्मूल॥
प्रकृति एक रूप अनेक।
बरसात हुई कैसा स्वरूप॥
गर्मी में जब चलती लू !
क्या स्वरूप ,
कैसा है रूप॥
ठंड लगती पर कैसा ठंड !
देखा किसी ने इनका रंग॥
रूप रंग ना है स्वरूप।
निराकार प्रकृति निर्मूल॥
सुंदर है ,
अनुपम स्वरूप !
निष्पक्ष है ;
सच कैसा यह रुप॥
बदली प्रकृति ;
बारिश हुई तब।
सब भीगे !
खुले आसमान नीचे॥
हों गरीब ,
भगवत् करीब ;
किसान या नौजवान।
चाहे कोई भी
हो धनी धनवान !
भीगे-भीगे से सभी समान॥
पड़ती भी है ,
एक ही गर्मी।
छूटे पसीना !
हों पंडित मौलवी ?
या ;
हों सुंदर कोई हसीना॥
बस ,
खुले आसमान के नीचे।
प्रकृति देता निष्पक्ष प्रमाण॥
है निष्पक्ष ;
निर्मूल निराकार।
नि:शब्द है...!
प्रकृति सब समान॥
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