फकीर खड़ा चुनाव मैदान में, कल, बल और छल के साथ।
ढहने से वही बच पायेगा, जो रहेगा मिलजुल हमारे हाथ। ।
तिकड़म-विकड़म चुनाव का, जाने सो विजेता होय।
आपस में ही जो लड़ि पड़े, वो विजेता कभी ना होय।।
लड़ि-लड़ि के भोथा भयो, जीत पाया नहीं एको बार।
जनता को जो बरगलाया, उसी पर किया सब ऐतबार।।
नेतागण लज्जा ना करे, मन की करते हैं खूब बात।
भक्तन भी बड़े अंधे हुए, दिन को कहे रात तो रात।।
कहे 'गिरिजा' चेत चेत रे! अवसर जइयो अब बीत।
प्रीत की यहाँ कोई रीत नहीं, वही प्यारो जो जीत।।
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