मुझे अचानक याद आ गए
बचपन के दिन—
गाँव के मेले,
नदी पार की यात्राएँ,
दोस्तों संग बिताए पल।
बरसात की रिमझिम में जब
गाँव की गलियों से पानी बहता था,
मैं कागज़ की एक नाव बनाता,
उसे पानी में छोड़ देता,
और देखता रहता—
ओझल होने से पहले तक।
आज घाट पर बँधी
वर्षों पुरानी एक नाव,
आशा का दीप बुझाए,
सामने बने सीमेंट के पुल को
चुपचाप निहारती है,
और आते-जाते राहगीरों से
जैसे कोई पुराना सवाल
करना चाहती है—
क्या सच में
हर नया रास्ता
पुराने को भुला देता है?
-हितेश रंजन दे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X