रूबरू चाँद है आँख लगती नहीं
लड़की बेदर्द चाहत समझती नहीं
मैंने तो चाँद में भी है ढूँढा उसे
एक वो है कि इज़हार करती नहीं
टूट जाते हैं बंधन यहाँ पे सभी
एक मेरी ज़ुबाँ है पलटी नहीं
दिल की हर बात रख दी थी उसके लिए
वो मगर मेरी ख़ामोशी पढ़ती नहीं
मैंने सौ बार दी हैं सदाएँ उसे
एक वो है कि आवाज़ सुनती नहीं
उसके आने की उम्मीद ज़िंदा है अब
ये अलग बात है राह दिखती नहीं
दर्द आँखों में लेकर मुसाफ़िर हूँ मैं
कोई मंज़िल मुझे आज मिलती नहीं
इश्क़ सच्चा हो तो वक्त रुकता नहीं
पर ये किस्मत है जो साथ चलती नहीं
नाम उसका मेरे दिल पे लिख्खा है यूँ
जैसे तहरीर कोई बदलती नहीं
अब दुआ है कि वो भी समझ ले मुझे
हर कहानी सदा यूँ अधूरी नहीं
-इम्तियाज़ रज़ा
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