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जात-पात पर लिखता हूँ

                
                                                         
                            जात-पात पर लिखता हूँ तो आग बदन में लगती है,
                                                                 
                            
सच्चाई कड़वी होती है, लोगों को चुभने लगती है।
कहते हैं सब खत्म हुआ ये ऊँच-नीच का किस्सा अब,
पर जातिवाद अभी ज़िंदा है — ये हम सबकी ही गलती है।
और पनप रहा था चंबल में जो नारी का प्रतिशोध था,
सहन किया था फूलन ने जो ज़ुल्म बड़ा घनघोर था।
वो ऊँच-नीच का भेदभाव सीने में आग लगाता है,
फूलन ने जो ज़ुल्म सहा, वो दिल को भी दहलाता है।
सुलग रहा है जातिवाद अभी संविधान के पन्नों में
इंसान अभी भी बंटा हुआ है जाति धर्म के खन्नो में
धर्म और जाति का नशा उस वक्त उतर ही जाता है
जब जरूरत पड़ती रक्त की फिर कोई नजर ना आता है
अब याद रखो की आग लगे ना कोई बचाने आएगा
क्या है उसका दीन धर्म ना तुमको वह दिखलाएगा
मानवता का पाठ हो वह तुमको यूं दिखलाएगा
वो पड़ोसी आकर ही सारी आग बुझाएगा
अब याद रखो की आग लगे ना कोई बचाने आएगा
क्या है तेरा दीन धर्म किसको तू दिखलाएगा
मानवता का पाठ पढ़ो इस राजनीति से दूर रहो
वो पड़ोसी आकर ही सारी आग बुझाएगा
-इम्तियाज़ रज़ा अली खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
58 मिनट पहले

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