आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हम बर्बाद नहीं पर आबाद भी नहीं

                
                                                         
                            हम आज बर्बाद नहीं पर हम आज आबाद भी नहीं।
                                                                 
                            
बर्बादी हमारी हो ऐसा हमारा होगा कोई कार्य नहीं।।

पर हम आबाद भी हो सकें ऐसा कोई आधार नहीं।
शिद्दत से,जतन से आगे बढ़ने का हमारा प्रयास
जिसमें आज भी कोई आग नहीं।।

ज्योत जलाए रखने का इंदिरा का रहेगा हर आगाज़ ।
तेरे बार बार मुझे यूँ बेखौफ गिराने का भी जबाव नहीं।।

दरख़्त के साए में हैं जो आज भी कुछ ऐसे मदहोश।
जिन्हें आगामी ख़तरों का ज़रा भी हुआ एहसास नहीं।।

हम न होंगे कभी बर्बाद, पर आबाद तो होंगे जरूर।
नशा है जो मेरी आबादी का मुझ पर, सर से मेरे आज भी उतरा ही नहीं।।

हम आज बर्बाद नहीं पर हम आज भी आबाद नहीं।
बर्बादी हमारी हो ऐसा हमारा होगा कोई कार्य नहीं।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर