आए हो जग में कर्म करो निद्रा छोड़ो जागो जागो।
है युद्ध क्षेत्र जीवन सारा इससे कायर बन मत भागो।
हैं शस्त्र शास्त्र दोनों जीवन में उपयोगी ये मत भूलो।
जो जहाँ दिखे अनिवार्य उसी को हाथ बढ़ा करके छू लो।
हिंसक भेड़िए शास्त्रों का कब अर्थ समझ पाए सोचो,
इन पर तो शस्त्र प्रहार करो मत मोह पाश में ही झूलो।
अर्जुन सा मोह ग्रसित होकर अस्त्रों शस्त्रों को मत त्यागो।।१॥
जिसकी जैसी प्रवृत्ति होती वो कहाँ बदल ही पाता है।
फिर सीख मिली जो बपचन से आचरण वही दिखलाता है।
जिनके रग रग में नफरत ही बन करके लहू दौड़ती हो
घर से लेकर पुस्तक तक में बस नशा पढ़ाया जाता है।
ऐसों का बहिष्कार करिए मत शब्द बँदूकें ही दागो।।२॥
सत्कर्म सदा पूजे जाते हों राष्ट्र समर्पित कर्म सभी।
मन दृढ़ता को ना त्याग सके चाहे आएँ तूफान कभी।
क्षण भर का विचलन होगा तो सारी पूँजी खो जाएगी,
यदि काम राष्ट्र के आ पाए ये जीवन होगा सफल तभी।
'रत्नेश' करे ये आवाहन मन राष्ट्र प्रेम में ही पागो।।३॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X