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हसरत मोहानी: दिल की तपिश को क्या करूँ सोज़-ए-जिगर को क्या करूँ

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कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म दीदा-ए-तर को क्या करूँ
दिल की तपिश को क्या करूँ सोज़-ए-जिगर को क्या करूँ

शोरिश-ए-आशिक़ी कहाँ और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ अपनी नज़र को क्या करूँ

ग़म का न दिल में हो गुज़र वस्ल की शब हो यूँ बसर
सब ये क़ुबूल है मगर ख़ौफ़-ए-सहर को क्या करूँ

हाल मेरा था जब बतर तब न हुई तुम्हें ख़बर
ब'अद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूँ
 

22 घंटे पहले

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