जीना हो यदि चाहते तो मरना लो सीख।
वरना जीवन की सदा रहो माँगते भीख।।१॥
जीवन इस संसार में, करमों का भुगतान।
जो बोया वह काट लो आगे रक्खो ध्यान।।२॥
काँटों में है फूल सा, जीवन लिए स्वरूप।
अंत मिलेगी धूल ही, निरधन हो या भूप।।३॥
सोने चाँदी से नहीं, शोभा तन कय होय।
पूजन होता कर्म का, सत्य यही नहि दोय।।४॥
माया लिपटय जीव कौ, आते ही संसार।
भक्ति हृदय में पनपते, माया मानै हार।।५॥
दिन के होते तीनि पन, सुबा दोपहर शाम।
जीवन की वैसै गति, उद्भौ युवा विराम।।६॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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