आपकी चलती है, अपने नाम का सहारा दे दो,
दिल खोलकर हमारे हाथों में हौसला दे दो।
हम पहले ही सहमे हैं आपके जाने के बाद,
किससे उम्मीद करें कि अपना साया दे दो।
यहाँ आईना भी अब चेहरों से डरने लगा है,
रुख़्सत होने से पहले अपना चेहरा दे दो।
डूब जाना ही मुक़द्दर न बन जाए अपना,
जो हुनर आपने सीखा है उसका तिनका दे दो।
बूँद-बूँद के लिए बरसों से तरस रहे हैं ये सभी,
आज दरिया है तुम्हारे पास, दरिया दे दो।
रास्ते ख़ुद ही मंज़िल तक पहुँच जाएँगे,
चलने का बस थोड़ा-सा हौसला दे दो।
इतनी भी बेरुख़ी अच्छी नहीं होती साहब,
जाते-जाते ही सही, तजुर्बे का कनका दे दो।
पूरी तैयारी से दुनिया कि है, मुट्ठी में आपने,
कोई कंगाल नहीं है, मगर इन्हें दुनिया दे दो।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
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