ग़मों ने ये बदसूरती दे दी हमें,
ज़िंदगी न दी ये कैसी ज़िंदगी दे दी हमें।
ज़माने की रुसवाइयों ने डराया मुझे,
फिर ज़माने ने दी बे-दिली हमें।
जलने के अंजाम से उम्र बचते रहे ,
दिल जला तब मिली है ये रोशनी हमें।
साफ़-साफ़ कह दो अब साथ न चल सकोगे,
अभी तो मुश्किल राह से है गुज़रनी हमें।
एक पल की मोहब्बत न हासिल है मुझे,
मोहब्बत की आस में है ज़िंदगी गुज़ारनी हमें।
है हवस कि जिस्म से जिस्म की आग बुझा लूँ,
फिर भी तो मोहब्बत है करनी हमें।
इल्म ही हासिल करता रहा हूँ उम्र भर,
फिर क्यों जाहिलों सी ज़िंदगी है गुज़ारनी हमें।
ये बनावट की ज़िंदगी हमें गवारा नहीं, जमशेद
बनावटी चीज़ों को है तोड़नी हमें।
हमें पाओगे तो तुमको गुमां आ जाएगा,
अब अपनी क़ीमत है गिरानी हमें।
कैसे भी ग़म-ए-हयात बसर हो जाए नूर,
जाने कैसे मिली है ये ज़िंदगी हमें।
-नूर हसन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X