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ग़ज़ल -"हम भी बोल सकते थे"

                
                                                         
                            हवा जैसी बहे, उसके मुताबिक़ डोल सकते थे।
                                                                 
                            
हमारे पास सबके राज़ थे, सब खोल सकते थे।

हमें हर हाल में रिश्ता बचाना था मगर अब सुन,
हमें भी बोलना आता है, हम भी बोल सकते थे।

मुझे तो सब पता है कि, तुम्हीं ही कान भरते हो,,,,
मगर चाहूँ, जहर हम भी, सभी के घोल सकते थे।

पृथक करना तुम्हे आता, खुशामद भी तुम्हे आता,,,
सभी को एक पड़ले में, तुम भी तो तोल सकते थे।

मगर हम कुछ नहीं बोले, कभी भी मुँह न खोले "जय",,,,,
अगर चाहत तनिक होती, तुम्हें यूँ रोल सकते थे।


 
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25 मिनट पहले

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