जो रचनाएँ किसी के मौन में
फूलती-फलती हैं,
जो दर्द के पिघलने से
कविता का आकार
लेकर चलती हैं,
उन्हें नहीं चाहिए होता है छंदों का बंधन,
लय का आधार;वे स्वतः ही बड़ी हो जाती हैं।
जो रचनाएँ
रात भर आँसुओं से धुली जाती हैं,
जो पीड़ा की छेनी से गढ़ी जाती हैं,
जिन रचनाओं की प्राण-प्रतिष्ठा
एकांत में की जाती है,
जो रचनाएँ ईश्वर का रूप धारण कर
व्यक्ति को आत्महत्या से रोकती हैं;
वे रचनाएँ स्वतः ही पूजनीय हो जाती हैं।
जो रचनाएँ गिनती हैं
रातों की हिचकियाँ,
बेहिसाब सिसकियाँ,उन्हें ज़रूरत नहीं होती
मात्राओं की गणना की,किसी मिथ्य कल्पना की;हाँ, इन रचनाओं में मेहनत नहीं लगती,
इनमें लगती हैं जीवन की वास्तविक घटनाएँ,आपबीती और अनंत वेदनाएँ!
फिर ये रचनाएँ स्वततः ही सुंदर हो जाती हैं।
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