मैंने इन दो आंखों से
जाने कितनी
आत्म हत्याएं देखी हैं।
पर ये हत्याएं मनुष्य की
नहीं होती ;उसके मन की होती है।
आपने भी तो मारा होगा
कई बार अपने मन को
लेकिन कब??
कभी अपनों के लिए,
तो कभी समाज के लिए तो कभी..
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