आज तुम्हारा हाथ थाम रखा मैंने,
बड़े होकर क्या इसे याद रखोगे?
बूढ़ी हो, जब कभी लड़खाऊंगी मैं,
मेरे बच्चे—तुम मेरा हाथ थाम लोगे?
हाँ माँ, ये पल दिल में सदा बसे रहेंगे,
तेरी गोद की गर्माहट क्या भूल पाऊंगा?
तेरी आँखों ने जो सपने बुन रही आज,
उन्हें एक दिन पूरा कर वादा निभाऊँगा।
जब झुर्रियाँ सजेंगी तेरे चेहरे पर,
और कदम लड़खड़ाने से लगेंगे,
तब मैं तेरा सहारा बनूँगा उस पल,
तेरी मुस्कान को फिर से लौटाऊँगा।
तेरे आँसू कभी न बहें, ये प्रण करूँ आज,
तेरी थकान को अपनी हँसी से मिटाऊँगा।
आज तू थामे मेरा हाथ, कल मैं थामूँगा,
ये बंधन अमर रहेगा सदा, कभी न टूटेगा।
—कमल किशोर झा
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