सुकून ढूंढने वो चला,
भटका वो इधर-उधर।
पर वो न मिला कहीं,
फिर आँखें जो बंद कीं।
फिर पता चला उसे,
सुकून तो सोया बैठा
मस्त उसके ही अंदर।
उसने उसे जगाया,
बोला, "क्यों छुपे बैठे थे?"
वह बोला, "डरे सहमे,
तुमने ही न सुनी कभी?
मैंने तो आवाज लगाई
अंदर से हर बार-बार।
खैर, अब न खोने देना,
जब भी जरूरत लगे,
तेरे ही अंदर मिलूंगा।
बस आवाज लगाना,
निकल गले लगूंगा।"
—कमल किशोर झा
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