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नैन के दीपक जले हैं दरस की ही आस में

                
                                                         
                            जब पुकारै प्रीत मोरी लौट अइयौ कान्ह
                                                                 
                            
नैन के दीपक जले हैं दरस की ही आस में

डाल पे कदंब की जब झूलते इक साथ
हाथ में छलिया दियो जो बाँवरी को हाथ
यमुना के तीरे सुहानी वो मिलन की ठौर
भूल कैसें जाय राधा साँवरे की बौर
प्रीत की हर एक कसौटी पे खरी थी श्याम
आँसुअन की धार बहती दरस की ही आस में

जल रही है आजहूँ ये नेह की ही जोत
विरह में तप तप भयो है कंचन सो अकार
काल की आँधी चलै या जग करै परिहास
छूट ना पावै कभू यों साँवरे को रास
नैन ये पथरा गए हैं जोहते ब्रज पंथ
सांस भी अब चल रही है दरस की ही आस में

बाँसुरी की तान में अब पीर बाजे मीत
विरह की पीड़ा बनै अब राधिका को गीत
प्रेम की पोथी अधूरी रह गई ब्रज धाम
रोम रोम पुकारत है साँवरे को नाम
पीर का यह ग्रन्थ बांचो हे मेरे घनश्याम
प्राण भी अब अड़ गए हैं दरस की ही आस में

-भानु शर्मा रंज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
44 मिनट पहले

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