आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Urdu Poetry: मुस्तैद है सरकार ये कह कर चले गए

उर्दू अदब
                
                                                         
                            हम सब हैं  शर्मसार  ये कह कर चले गए 
                                                                 
                            
मुस्तैद  है   सरकार  ये  कह कर चले गए 

जितने  थे   चश्मदीद  वो   मुकरे  बयान  से 
झूठे हैं सब अखबार ये  कह  कर चले गए 

होती  रही  है  द्रोपदी  सदियों से निर्वसन 
खामोश   कर्णधार  ये  कह  कर  चले  गए 

जिन  पर  टिकी  हुई थी ये संसद की आबरू 
संसद  है अभी यार ये  कह कर चले गए 

बख्शे न  जाएंगे  कभी  जो  होंगे गुनहगार 
झेलो भी अब हुंकार  ये  कह  कर चले गए 

है व्यर्थ सियासत यह सरकार के खिलाफ 
सत्ता  के   चाटुकार  ये   कह  कर चले गए 

कलयुग  है  इसमें  होते  रहेंगे ये  जरायम
बन कर के  भाष्यकार  ये कहकर चले गए 

`ये  आगजनी, कत्ल, ये अखबार-बाजियां--
यह  सब  है  दुष्प्रचार ये कह कर चले गए.

बच्चों  औ  नौनिहालों  पे चलवा के लाठियाँ 
'अब चिल भी करो यार',ये कह कर चले गए

लोगों  के  मनोबल  को  बूटों  से  कुचल  के
सब  हैं   गुनाहगार   ये   कह  कर  चले गए 

मुश्किल न था कि आ के पूछ लेते हाल 'ओम'
सत्ता  से   डरो   यार  ये   कह  कर  चले गए 

~ ओम निश्चल

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

21 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर