वादों का मौसम रोज़ नया अख़बार हुआ,
सपनों का सूरज भी कितना बीमार हुआ।
फील गुड की खुशबू आई, फिर खो गई,
मेक इन इंडिया भी पोस्टर का यार हुआ।
काले धन की गंगा कब लौटेगी बोलो,
हर चौखट पर केवल झूठ प्रचार हुआ।
नोटबंदी की माला जपते रहे पुजारी,
जनता का सिक्का लेकिन लाचार हुआ।
गंगा बोली—मुझे न नारों से धोओ,
मैं मैली हूँ, तुमसे ही व्यापार हुआ।
भाषण के घोड़े दौड़े लाल किले से,
भूखा बच्चा फिर भी कर्ज़दार हुआ।
योजनाओं की चिड़िया उड़ती आकाश,
धरती पर पर टूटा हर बार हुआ।
सपनों के पुल बनते काग़ज़ के दम पर,
सच का पानी रोज़ ही शर्मसार हुआ।
आँकड़ों की चुनरी ओढ़े सत्ता बैठी,
सच बेचारा कोने का अख़बार हुआ।
जन-मन-धन के दीप जले फोटो में,
घर का चूल्हा फिर भी अंगार हुआ।
बुलेट ट्रेन ने नींद चुराई खेतों की,
हल का बेटा शहर में बेकार हुआ।
स्मार्ट सिटी के शीशमहल चमकीले,
गाँव का आँगन लेकिन बीमार हुआ।
रोज़गार के मेले केवल भाषण में,
युवा हथेली पर लिए इतवार हुआ।
वादों की खेती में केवल झूठ उगा,
सपना हर मौसम में बीमार हुआ।
देशभक्ति के पोस्टर रोज़ चिपकाए,
भूखा पेट मगर गुनहगार हुआ।
काग़ज़ पर गंगा निर्मल बहती है,
जल में कचरे का ही विस्तार हुआ।
काले कौवे बने हुए हैं पहरेदार,
उजले हंसों पर पहरा दुश्वार हुआ।
सत्ता बोली—सब कुछ बदला-बदला है,
जनता बोली—केवल आकार हुआ।
मंदिर-मंच से भाषण की बारिश में,
सच का चेहरा और लाचार हुआ।
फाइलों में सोती रहीं सभी योजनाएँ,
धरती का हर सपना कर्ज़दार हुआ।
इतिहासों की थाली में जयकार सजी,
वर्तमान मगर सूना दरबार हुआ।
लोकतंत्र के मेले में सब खुश दिखते,
भीतर-भीतर केवल हाहाकार हुआ।
अब भी उम्मीद का दिया जलाए बैठे,
पर हर वादा मौसम का अख़बार हुआ।
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