इश्क़ कर लूं या छल से उठा लूं,
ख्वाबों के शहर में,आ गिरा
हुस्न का पहरेदार हूं
तू कहे तो ----
तारे चुरा लूं या आसमा उठा लूं।
अब न हो कोई हलचल,ये बता दूं,
जिसे छेड़ा है मैने,
फिर से किसी को
तू कहे तो---
बहाना बना लूं या हुस्न से उठा लूं।
पीर रोती रही,आंख को दुआ दूं
रात्रि सोती रही,
नींद बेचैन मेरी,
तू कहे तो ---
भोर को जगा लूं या उजाले उठा लूं।
जुल्फें संवारूं या आंचल उठा लूं,
मेरे महबूब कातिल,
,ये जाम भर के उछालूं
लहर खेलती है साए से मेरे,
तू कहे तो ---
कश्ती संभालूं या समंदर उठा लूं।।
- अवध बिहारी मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X