*पास में बैठे हुए उनके हमें,
जब भी देखा होगा।
सोचने वाले ने दिल में क्या -क्या,
नहीं सोचा होगा।।
*है वक्त अभी भी गुनाहों से,
अपने तौबा कर लो,
संभलने के वास्ते फिर तेरे पास,
नहीं मौका होगा।।
*शाद-ए-दिल हुआ ना-शाद क्यूं,
भला जानते हो,
मिरा पैग़ाम शायद उस तक,
नहीं पहुंचा होगा।।
*उठा के क़सम वो झूठ पे झूठ,
बोला अदालत में,
मुझे यकीं है मेरा बाल भी,
नहीं बांका होगा।।
*मज़ाक उड़ाकर सभी का खूब,
मज़ा लेता है वो,
कभी उसने अपने गिरेबान में,
नहीं झांका होगा।।
* सच की दम पर ही हर जंग जीत,
जाता हूं मैं,
सामने वाले को खुद से कमतर,
नहीं आंका होगा।।
*उन्हें देखे बिना न तो चैन है ,
न सुकून है "पत्थर",
उस जैसा हसीन जग में और,
नहीं दूजा होगा।।
पास में बैठे हुए................................
-पत्थर फ़र्रूख़ाबादी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X