आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दौर-ए-अज़ीयत में अपनों की चाहत का क्या कीजे

                
                                                         
                            दौर-ए-अज़ीयत में अपनों की चाहत का क्या कीजे
                                                                 
                            
दिल ही मर गया तों फिर तौक-ए-मुहब्बत का कीजे

एक मुद्द्त हुई तेरे दर पऱ बैठे हुए इबादत में हमकों
मन्नत का धागा ही टूट गया तों शिद्दत का क्या कीजे

क्या डरायेगा ये ज़माना हमको कयामत के ख़ौफ़ सें
पाया हैं दाग़-ए-मुहब्बत क़ो तों राहत का क्या कीजे

ख्वाहिश हैं इस क़दर गले सें लगो मेरा निशां न रहे
मौत की कगार पऱ खड़े अब इस शराफत का कीजे

इस ज़िस्म की रिहाई मुमकिन तों हैं पऱ मग़र कृष्णा
पिंजरें में रूह फंस चुकी तों जमानत का क्या कीजे
-कृष्णा शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
37 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर