मेरा होकर भी वो किसी और के पास क्यूँ हैं
वो लौटकर आएगा ऐ दिल तुझें ये आस क्यूँ हैं
रोये बहुत हम,जुबाँ के लफ़्ज़ तों सूख गए जैसे
दिल का दर्द बहा तों फिर गले में खराश क्यूँ हैं
सबकुछ तों हमनें उस उपरवाले पऱ डाल दिया
तों इस जिंदगी में हमारे पास तमाम काश क्यूँ हैं
इश्क़ उपरवाले की रहमत,अश्क़ उसका इनाम
तों फिर इस दिल में गड़ी दर्द की ये फांस क्यूँ हैं
इश्क़ में महबूब ख़ुदा हों जाता हैं हवस नहीं रहती
तों फिर आज़कल का इश्क़ इतना अय्याश क्यूँ हैं
तेरी मुहब्बत में कमी हैं या मेरी ही उम्मीदें ज्यादा
तू पास हैं फिर भी मुझे तुझमें तेरी तलाश क्यूँ हैं
जिंदगी ख़ुद की सपने का बोझ दूजो का उस पऱ
आज़ादी हैं तों फिर अपनों के इतने पाश क्यूँ हैं
हमनें तों अपनी अना आपके कदमों में रख दी
तों फिर आपके लफ्ज़ो में इतनी इफ़लास क्यूँ हैं
तालीम जीना सिखाती हैं ख़्वाब बुनना सिखाती हैं
तों तलबा की हाक़ीम के कदमों में ऐसे लाश क्यूँ हैं
कृष्णा छोड़ दूँ रंज-ओ-ग़म सारे उदासीन हों जाऊँ
पऱ इतना बता हर इल्ज़ाम मेरे ही आस-पास क्यूँ हैं..
-कृष्णा शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X