आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आफ़ताब हुसैन: उसी तरह के शब-ओ-रोज़ हैं वही दुनिया

aftab hussain famous ghazal usi tarah ke shab o roz hain wahi duniya
                
                                                         
                            


उसी तरह के शब-ओ-रोज़ हैं वही दुनिया
पुरानी ख़ाक पे ता'मीर है नई दुनिया

मैं अपने आप में गुम था मुझे ख़बर न हुई
गुज़र रही थी मुझे रौंदती हुई दुनिया

हर आदमी को ये दुनिया बदल के रख देगी
बदल सका न अगर अब भी आदमी दुनिया

नई हवा को मदद के लिए पुकारती है
ख़ुद अपनी आग में जलती हुई नई दुनिया

मैं जिस हवाले से दुनिया पे ग़ौर करता हूँ
उसी तरह से कभी काश सोचती दुनिया

मैं अपने अस्ल की जानिब रवाँ-दवाँ हूँ और
बुला रही है मुसलसल मुझे मिरी दुनिया
 

एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर