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ग़ज़ल

                
                                                         
                            उससे कहना वो किसी और सें इश्क़ दुबारा न करे
                                                                 
                            
उसके दर मर जाऊँ उसको दाग़ लगे खुदारा न करे

हर एक आज़माइश में वफ़ा करके भी कंधा न मिले
ख़ुदा किसी भी शख्श क़ो इतना भी बेसहारा न करे

हर चौखट सजदा करे फिर भी दर-दर रूलता फिरे
वक़्त किसी भी शख्श क़ो इतना भी बंजारा न करे

मुहब्बत के ख़ातिर दामन फैलाये उस पे नाक रगड़े
हाथ मिन्नतों में अकड़ जाए इतना भी खसारा न करे

न होश रहे न हवास रहे न कुछ भी उसको याद रहे
रोग लगे महबूब का,मुहब्बत ऐसे भी आवारा न करे

भीख मांगे मुहब्बत की,महबूब के पैर पड़े दिन-रात
हाय ये दिल किसी क़ो इतना भी जान सें प्यारा न करे

"कृष्णा" खुदखुशी हराम हैं तों ये हाल हैं दुनिया का
बेबसी किसी के आगे वाहिद ख़ुदखुशी चारा न करे..
-कृष्णा शर्मा
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3 दिन पहले

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