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मुझे मेरा पता दे दो कोई

                
                                                         
                            ना जाने किस दौर मेँ हुँ
                                                                 
                            
रात मेँ हुँ या भौर मेँ हुँ
मुझें मेरा ही पता नही
मुझें मेरा पता दे दो कोई
ख़ो गयी हुँ जाने कहा मेँ
मुझें मुझसे ही मिलवा दो कोई
मुस्कुराहट मेरे पास आती ही कहाँ है
ये उदासी मेरे पास सें जाती ही कहाँ है
खुशियाँ तो जैसे मेहमान है अनजान सी
उन्हें मेरे घर का पता दे दो कोई,
हर सुबह एक उम्मीद रहती है
सब सही होगा ये कहती है
ना जाने फिर रात तक दिल क्यों हार जाता है
ये ना घर सें बाहर जाता है
टूट जाती है उम्मीद सारी
इसे अच्छे सें बहला दो कोई
मुझें मेरा पता दे दो कोई
सब अच्छा होगा मुझें ये समझा दो कोई...
-मंजू आस्था
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

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