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वैसे ही रात सिमट गयी

                
                                                         
                            ना दिन का पता रहता है अब
                                                                 
                            
रात कब आयी और ना जाने कब गयी
जैसे शुरु हुआ था दिन...
वेसें ही रात सिमट गयी
इतनी परेशा हुँ मेँ आजकल
मुस्कान भी उदासी मेँ बदल गयी
नाम और चेहरे सबके
अनजान सें लगते है मुझको
ये मुझको भूले है या मेँ इनको भूल गयी
दिन तारीखे कुछ भी मुझको याद कहाँ
ऐसा सब कुछ तेरे जाने के बाद हुआ
एक तेरे सिवा कुछ भी मुझको याद नही
तु मुझको भुला या मुझको ही तु याद नही
इसी कसमकस मेँ आधी जिंदगी गुजर गयी
जैसे शुरु हुआ था दिन वैसे ही रात गुजर गयी.
-मंजू आस्था
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

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